यह ग़ज़ल दुष्यंत कुमार की सबसे मशहूर ग़ज़ल है। उनकी ग़ज़लों के एकमात्र संकलन का नाम भी है " साए में धूप " जो सबसे पहले १९७५ में प्रकाशित हुई। इसकी लोकप्रियता इसी बात से जाहिर है की अबतक इसके तकरीबन बीस संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इस ग़ज़ल को दुष्यंत ने इमर्जेंसी के दौरान लिखा । यह ग़ज़ल आज भी प्रासंगिक है । तो सुधिजन पेश है दुष्यंत कुमार की वो ग़ज़ल जिसने ग़ज़ल के शिल्प, शैली , भाषा और तेवर ही बदल डाले और ग़ज़ल को इश्क की रूमानियत से निकाल कर इसे आम आदमी की अनुभूतियों और मुश्किलों को अभिव्यक्त करने का माध्यम बना डाला और हिन्दी साहित्य में ग़ज़ल लेखन की परम्परा की शुरुआत हुई।
कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए ,
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।
यहाँ दरख्तों के साए में धूप लगती है,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए ।
न हो कमीज़ तो पावों से पेट ढक लेगें ,
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए।
वे मुतमईन हैं की पत्थर पिघल नहीं सकता,
मैं बेकरार हूँ आवाज़ में असर के लिए।
तेरा निजाम है सिल दे जुबान शायर की,
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहार के लिए।
जियें तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।
(कॉपी राइट : श्रीमती राजेश्वरी त्यागी )
कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए ,
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।
यहाँ दरख्तों के साए में धूप लगती है,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए ।
न हो कमीज़ तो पावों से पेट ढक लेगें ,
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए।
वे मुतमईन हैं की पत्थर पिघल नहीं सकता,
मैं बेकरार हूँ आवाज़ में असर के लिए।
तेरा निजाम है सिल दे जुबान शायर की,
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहार के लिए।
जियें तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।
(कॉपी राइट : श्रीमती राजेश्वरी त्यागी )
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