Saturday, March 7, 2009

ग़ज़ल:2

ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा ,

मैं सजदे में नहीं था , आपको धोखा हुआ होगा ।

यहाँ तक आते - आते सूख जाती हैं कई नदियाँ ,

मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।

ग़ज़ब ये है की अपनी मौत की आहट नहीं सुनते,

वो सब -के - सब परीशां हैं वहां पर क्या हुआ होगा।

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुनकर तो लगता है,

कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा।

कई फाके बिताकर मर गया , जो उसके बारे में

वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं , ऐसा हुआ होगा।

यहाँ तो सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं,

ख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा।

चलो, अब यादगारों की अंधेरी कोठरी खोलें ,

कम-अज-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा।

(कॉपी राइट : श्रीमती राजेश्वरी त्यागी )

No comments:

Post a Comment