ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा ,
मैं सजदे में नहीं था , आपको धोखा हुआ होगा ।
यहाँ तक आते - आते सूख जाती हैं कई नदियाँ ,
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।
ग़ज़ब ये है की अपनी मौत की आहट नहीं सुनते,
वो सब -के - सब परीशां हैं वहां पर क्या हुआ होगा।
तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुनकर तो लगता है,
कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा।
कई फाके बिताकर मर गया , जो उसके बारे में
वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं , ऐसा हुआ होगा।
यहाँ तो सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं,
ख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा।
चलो, अब यादगारों की अंधेरी कोठरी खोलें ,
कम-अज-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा।
(कॉपी राइट : श्रीमती राजेश्वरी त्यागी )
No comments:
Post a Comment