मैं स्वीकार करता हूँ ......
- कि ग़ज़लों को भूमिका की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए, लेकिन एक कैफ़ियत इनकी भाषा के बारे में जरूरी है। कुछ उर्दू - दाँ दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर ऐतराज़ किया है । उनका कहना है कि शब्द 'शहर' नहीं 'शह्र' होता 'वज़न ' नहीं 'वज़्न' होता है।
-कि मैं उर्दू नहीं जानता, लेकिन इन शब्दों का प्रयोग यहाँ अज्ञानतावश नहीं, जानबूझ कर किया गया है। यह कोई मुश्किल काम नहीं था कि 'शहर' की जगह 'नगर' लिखकर इस दोष से मुक्ति पा लूँ, किंतु मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है, जिस रूप में वे हिन्दी में घुल-मिल गए हैं। उर्दू का 'शह्र' हिन्दी में 'शहर'लिखा और बोला जाता है; ठीक उसी तरह जैसे हिन्दी का 'ब्राह्मण' उर्दू में 'बिरहमन' हो गया है और 'ऋतु' 'रुत' हो गयी है।
-कि उर्दू और हिन्दी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती है तो उनमें फ़र्क कर पाना बड़ा मुश्किल होता है । मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओँ को ज़्यादा से ज़्यादा करीब ला सकूं । इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में कही गयी हैं जिसे मैं बोलता हूँ।
-कि ग़ज़ल की विधा एक बहुत पुरानी, किंतु सशक्त विधा है, जिसमें बड़े-बड़े उर्दू महारथियों ने काव्य -रचना की है । हिन्दी में भी महाकवि निराला से लेकर आज के गीतकारों और नए कवियों तक अनेक कवियों ने इस विधा को आजमाया है । परन्तु अपनी सामर्थ्य और सीमाओं को जानने के बावजूद इस विधा में उतारते हुए मुझे आज भी संकोच तो है, पर इतना नहीं जितना होना चाहिए था। शायद इसका कारन ये है कि पत्र-पत्रिकाओं में इस संग्रह की कुछ ग़ज़लें पड़कर और सुनकर विभिन्न वादों , रुचियों और वर्गों की सृजनशील प्रतिभाओं ने अपने पत्रों, मंतव्यों एवं टिप्पणियों से मुझे एक सुखद आत्म-विश्वास दिया है। इस नाते मैं उन सबका अत्यन्त आभारी हूँ।
- और कमलेश्वर ! वह इस अफसाने में न होता तो ये सिलसिला शायद यहाँ तक न आ पाटा मैं तो --
हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताये।
----- दुष्यंत कुमार