Tuesday, March 10, 2009

मैं स्वीकार करता हूँ .....('साए में धूप' की भूमिका )

मैं स्वीकार करता हूँ ......


- कि ग़ज़लों को भूमिका की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए, लेकिन एक कैफ़ियत इनकी भाषा के बारे में जरूरी है। कुछ उर्दू - दाँ दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर ऐतराज़ किया है । उनका कहना है कि शब्द 'शहर' नहीं 'शह्र' होता 'वज़न ' नहीं 'वज़्न' होता है।


-कि मैं उर्दू नहीं जानता, लेकिन इन शब्दों का प्रयोग यहाँ अज्ञानतावश नहीं, जानबूझ कर किया गया है। यह कोई मुश्किल काम नहीं था कि 'शहर' की जगह 'नगर' लिखकर इस दोष से मुक्ति पा लूँ, किंतु मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है, जिस रूप में वे हिन्दी में घुल-मिल गए हैं। उर्दू का 'शह्र' हिन्दी में 'शहर'लिखा और बोला जाता है; ठीक उसी तरह जैसे हिन्दी का 'ब्राह्मण' उर्दू में 'बिरहमन' हो गया है और 'ऋतु' 'रुत' हो गयी है।


-कि उर्दू और हिन्दी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती है तो उनमें फ़र्क कर पाना बड़ा मुश्किल होता है । मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओँ को ज़्यादा से ज़्यादा करीब ला सकूं । इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में कही गयी हैं जिसे मैं बोलता हूँ।


-कि ग़ज़ल की विधा एक बहुत पुरानी, किंतु सशक्त विधा है, जिसमें बड़े-बड़े उर्दू महारथियों ने काव्य -रचना की है । हिन्दी में भी महाकवि निराला से लेकर आज के गीतकारों और नए कवियों तक अनेक कवियों ने इस विधा को आजमाया है । परन्तु अपनी सामर्थ्य और सीमाओं को जानने के बावजूद इस विधा में उतारते हुए मुझे आज भी संकोच तो है, पर इतना नहीं जितना होना चाहिए था। शायद इसका कारन ये है कि पत्र-पत्रिकाओं में इस संग्रह की कुछ ग़ज़लें पड़कर और सुनकर विभिन्न वादों , रुचियों और वर्गों की सृजनशील प्रतिभाओं ने अपने पत्रों, मंतव्यों एवं टिप्पणियों से मुझे एक सुखद आत्म-विश्वास दिया है। इस नाते मैं उन सबका अत्यन्त आभारी हूँ।


- और कमलेश्वर ! वह इस अफसाने में न होता तो ये सिलसिला शायद यहाँ तक न आ पाटा मैं तो --


हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था,


कोई मुझे अंगारों की तासीर बताये।


----- दुष्यंत कुमार

Monday, March 9, 2009

दुष्यंत कुमार का ग़ज़ल पर व्यक्तव्य

" ज़िन्दगी में कभी-कभी ऐसा दौर आता है जब तकलीफ गुनगुनाहट के रास्ते बाहर आना चाहती है । उसमे फँसकर गमे-जानाँ और गमे - दौराँ तक एक हो जाते हैं। ये गज़लें दरअसल ऐसे ही एक दौर की देन हैं।
यहाँ मैं साफ़ कर दूँ कि ग़ज़ल मुझपर नाजिल नहीं हुई। मैं पिछले पच्चीस वर्षों से इसे सुनता और पसंद करता आया हूँ और मैंने कभी चोरी-छिपे इसमे हाँथ भी आज़माया है। लेकिन ग़ज़ल लिखने या कहने के पीछे एक जिज्ञासा अक्सर मुझे तंग करती रही है और वह है भारतीय कवियों में सबसे प्रखर अनुभूति के कवि मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपनी पीड़ा कि अभिव्यक्ति के लिए ग़ज़ल का ही माध्यम क्यों चुना ? और अगर ग़ज़ल के माध्यम से ग़ालिब अपनी निजी तकलीफ को इतना सार्वजनिक बना सकते हैं तो मेरी दुहरी तकलीफ़ (जो व्यक्तिगत भी है ओर सामाजिक भी ) इस माध्यम के सहारे एक अपेक्षाकृत व्यापक पाठक वर्ग तक क्यों नहीं पहुँच सकती ?
मुझे अपने बारे में कभी मुगालते नहीं रहे । मैं मानता हूँ , मैं ग़ालिब नहीं हूँ। उस प्रतिभा का शतांश भी शायद मुझमें नहीं है । लेकिन मैं यह नहीं मानता कि मेरी तकलीफ़ ग़ालिब से कम है या मैंने उसे कम शिद्दत से महसूस किया है । हो सकता है, अपनी-अपनी पीड़ा को लेकर हर आदमी को यह वहम होता हो ...लेकिन इतिहास मुझसे जुड़ी हुई मेरी समय की तकलीफ़ का गवाह खुद है ।
बस ...अनुभूति की इसी जरा -सी पूँजी के सहारे मैं उस्तादों और महारथियों के अखाड़े में उतर पड़ा। " -----दुष्यंत कुमार , कल्पना पत्रिका में छपे एक आलेख से ।

Saturday, March 7, 2009

ग़ज़ल:2

ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा ,

मैं सजदे में नहीं था , आपको धोखा हुआ होगा ।

यहाँ तक आते - आते सूख जाती हैं कई नदियाँ ,

मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।

ग़ज़ब ये है की अपनी मौत की आहट नहीं सुनते,

वो सब -के - सब परीशां हैं वहां पर क्या हुआ होगा।

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुनकर तो लगता है,

कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा।

कई फाके बिताकर मर गया , जो उसके बारे में

वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं , ऐसा हुआ होगा।

यहाँ तो सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं,

ख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा।

चलो, अब यादगारों की अंधेरी कोठरी खोलें ,

कम-अज-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा।

(कॉपी राइट : श्रीमती राजेश्वरी त्यागी )

साए में धूप

यह ग़ज़ल दुष्यंत कुमार की सबसे मशहूर ग़ज़ल है। उनकी ग़ज़लों के एकमात्र संकलन का नाम भी है " साए में धूप " जो सबसे पहले १९७५ में प्रकाशित हुई। इसकी लोकप्रियता इसी बात से जाहिर है की अबतक इसके तकरीबन बीस संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इस ग़ज़ल को दुष्यंत ने इमर्जेंसी के दौरान लिखा । यह ग़ज़ल आज भी प्रासंगिक है । तो सुधिजन पेश है दुष्यंत कुमार की वो ग़ज़ल जिसने ग़ज़ल के शिल्प, शैली , भाषा और तेवर ही बदल डाले और ग़ज़ल को इश्क की रूमानियत से निकाल कर इसे आम आदमी की अनुभूतियों और मुश्किलों को अभिव्यक्त करने का माध्यम बना डाला और हिन्दी साहित्य में ग़ज़ल लेखन की परम्परा की शुरुआत हुई।

कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए ,
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।

यहाँ दरख्तों के साए में धूप लगती है,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए ।

न हो कमीज़ तो पावों से पेट ढक लेगें ,
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए।

वे मुतमईन हैं की पत्थर पिघल नहीं सकता,
मैं बेकरार हूँ आवाज़ में असर के लिए।

तेरा निजाम है सिल दे जुबान शायर की,
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहार के लिए।

जियें तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।
(कॉपी राइट : श्रीमती राजेश्वरी त्यागी )